Friday, May 17, 2013

आस्था या अंधविश्वास

पिछले कुछ समय से जब भी किसी तीर्थ स्थान या ज्यादा टी.आर.पी.(टूरिस्ट रेटिंग पॉइंट) वाले मंदिरों में गई तो वहाँ से लौटने के बाद मन में एक ही विचार आया कि अगली बार ऐसी किसी जगह नहीं जाना है, लेकिन आदतन कुछ दिनों के बाद सब भूलकर फिर वही गलती कर बैठती हूँ. इस बार मेरे इस लेख का उद्देश्य भी यही है कि अपनी इस भूल को याद रख सकूँ. वैसे मेरे इस विचार का मतलब यह कतई न समझा जाए कि मेरी ईश्वर में आस्था नहीं है या खत्म हो गई है. मेरी आस्था आज भी ईश्वर पर उतनी ही है जितनी कुछ सालों पहले थी जब मैं घंटो अपना समय पूजा-पाठ के कामों में बिता दिया करती थी. फर्क बस इतना आया है अब इन अंधविश्वासों और आडंबरों को तर्क की दृष्टी से देखने की आदत-सी हो गई है. ईश्वर में आस्था अब भी बरकरार है लेकिन धर्म में व्याप्त बुराइयों से मन दुखी हो जाता है. कई लोगों को मेरे इस विचार से समस्या हो सकती है, लेकिन मेरा उद्देश्य केवल उन बुराइयों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करना है जिन्होंने धर्म और धार्मिक जगहों को गंदा कर दिया है. अपने घर में बने छोटे से मंदिर या मुहल्ले के मंदिरों में सर झुकाते वक्त मन में जितनी श्रद्धा उमड़ती है, तीर्थ स्थान या सुप्रसिद्ध मंदिरों में इसका आधा भी महसूस नहीं होता. इन जगहों में जो बातें दिमाग में चलती रहती हैं वे कुछ इस प्रकार हैं- जूते-चप्पल ठीक से रखो कहीं चोरी न हो जाएँ, कहीं ये हमें ठग तो नहीं रहा, पंडितों के चक्कर में मत पड़ो वरना पॉकेट खाली हो जाएगी, उफ़ इतनी गंदगी है जैसे मंदिर नहीं कचराघर हो, किसी तरह जल्दी दर्शन हो जाए लाइन में खड़े-खड़े हालत खराब हो गई और लाख कोशिशों के बावजूद आखिर हम ठगी के शिकार बन ही गए, आदि. मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ऐसा सोचने वाली मैं अकेली नहीं, ज्यादातर दर्शनार्थियों के दिमाग में यही बातें चल रही होती हैं. अब ऐसे में पूजा-पाठ में कैसे मन लग सकता है. बचपन से लेकर आज तक जब भी कहीं घुमने की योजना बनी तो किसी न किसी प्रसिद्ध मंदिर या तीर्थ-स्थान का चुनाव किया गया. ऐसा होना लाजिमी भी है मंदिरों के इस देश में मध्यवर्ग की मानसिकता के अनुकूल जो है, एक पंथ दो काज जो हो जाते हैं. लड़कपन में भले ही समझदारी न हो लेकिन माता-पिता को परेशान देखकर एहसास तो हो ही जाता था कि भगवान् के दर्शन करना इतना आसान नहीं है, खासकर जब पास में पैसे कम हों. झारखंड का देवघर शिवभक्तों के लिए बहुत ही पावन भूमि मानी जाते है, लेकिन यहाँ के पंडा (पंडित) के जाल से बचना लगभग नामुमकिन है. खासकर तब जब आपको कोई कर्मकांड भी कराना हो. काशी में भी तक़रीबन यही स्थिति है. मंदिर में प्रवेश करते ही हर दुकानदार इस तरह अपने दुकानों में अपने जूते-चप्पल रखने की विनती करते हैं जैसे आपके जुते रखते ही उनका दुकान पवित्र हो जाएगा. इसके बाद आपको पूजा हेतु आवश्यक सामाग्री देकर (उनके हिसाब से) पूजा करने भेज दिया जाएगा. वापस आने पर पता चलता है की उस सामान का आपसे दुगुना-तिगुना दाम वसूला जा रहा है. आप चाह कर भी न कुछ कह पाएंगे और न ही कुछ कर पाएंगे क्योंकि आपको पापी और नास्तिक साबित करने में एक मिनट की भी देरी नहीं की जाएगी. आपके साथ ऐसा बर्ताव किया जाएगा जैसे आप उस दुकान में जबरन घुस आए हों. ऐसा तक़रीबन हर बड़े मंदिरों में आपको आसानी से देखने को मिल जाएगा. इन मंदिरों में आपको भगवान की मुख्य मूर्तियों के अलावा छोटी-बड़ी सैकड़ों मूर्तियाँ नजर आएँगी और उसके बगल में एक पंडित नजर आएगा जो आपको वहाँ पैसे चढ़ाने की नसीहत देगा. अगर आपने उसकी बात अनसुनी की तो आपको भला-बुरा सुनाया जाएगा और उसी ईश्वर के कहर का भी खौफ दिलाया जाएगा. महाराष्ट्र का त्रयंबकेश्वर हो या अन्य कोई ज्योतिर्लिंग सबकी तक़रीबन यही स्थिति है. कोलकाता के प्रसिद्ध कालीबाड़ी में तो पंडित लाइन लगाकर ग्राहकों (भक्तों) का इंतजार करते हैं ताकि वे उनको अपने जाल में फंसा सकें. वीआईपी दर्शन का लालच भी दिया जाता है. मंदिर परिसर के पास ही पुलिस थाना है और सिपाही मंदिर में चौकसी करते नजर आते हैं इसके बावजूद यह सब खुले आम हो रहा है. जब थाना प्रभारी से इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि वे इससे निबटने में सक्षम हैं लेकिन उनके हाथ बंधे हुए हैं. कोई भी सरकार धार्मिक विवादों से परहेज ही करती है. इसके बावजूद पुलिस समय-समय पर इन पर शिकंजा कसती रहती है, लेकिन जागरूकता के अभाव और अंधविश्वास के कारण इनका कारोबार फल-फूल रहा है. इनदिनों शिर्डी के साईं बाबा की लोकप्रियता काफी बढ़ रही है. जाहिर सी बात है यहाँ के लोगों का धंधा भी जोर-शोर से चल रहा है. यहाँ पंडितों का खतरा तो नहीं लेकिन शिर्डी जाना बहुत महँगा पड़ सकता है. होटल का रेट दिन और भीड़ के हिसाब से तय किया गया जाता है. बुधवार और गुरुवार रेट सबसे अधिक होता है. शनिवार और रविवार को छुट्टी का दिन होने की वजह से ज्यादा दर्शनार्थी जुटते हैं सो उस दिन कमरे के लिए मोटी रकम चुकानी पडती है. 1-2 घंटे के लिए कमरा लेना भी काफी महँगा है. गया का विश्वप्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर हो या बौद्धों की सबसे पावन-भूमि बोध गया, पैसे वसूलने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं. बोध गया में तो खासकर विदेशियों को निशाना बनाया जाता है. पूरे मंदिर-परिसर में उनसे छोटी-से-छोटी चीज के लिए मनमानी रकम वसूली जाती है. भले ही भारत मंदिरों का देश हो लेकिन यहाँ के मंदिरों की दशा काफी बुरी है. एक तो ठग हर मोड़ पर आपका इंतजार करते रहते हैं वहीँ दूसरी ओर गंदगी आपको नाक-भौं सिकोड़ने पर मजबूर कर देती है. अंधश्रद्धा के आगे सरकार ने भी घुटने टेक दिए हैं क्योंकि वह भी अपना वोट-बैंक ख़राब नहीं कर सकती. ऐसे में अगर मेरा मन इन तथाकथित पवित्र जगहों पर जाने का नहीं करता तो क्या मैं नास्तिक हूँ? (18 मार्च 2013 को जनसत्ता "दुनिया मेरे आगे" में प्रकाशित)

Thursday, November 8, 2012

शर्मिला तुझे सलाम

वर्धा में एक बार फिर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्द्यालय के छात्र-छात्राएँ मोमबत्ती की रौशनी में उम्मीद की किरण ढूँढते नजर आये. भले ही सरकार और मीडिया के लिए यह अनशन कोई मायने न रखे लेकिन यहाँ इरोम चानू शर्मिला के लिए सबके दिलों में दर्द था. विश्वविद्द्यालय के नौजवानों ने इरोम के संघर्ष को समझा ही नहीं बल्कि महसूसा भी. छात्रों द्वारा मणिपुर में 12 सालों से अनशन पर बैठी इरोम के समर्थन में एक कार्यक्रम ‘इरोम शर्मिला से एक संवाद’ आयोजित किया गया. इसका असर वहाँ मौजूद हर शख्श के चेहरे पर साफ़ दिख रहा था. पहले एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई. डॉक्यूमेंट्री यह बताने को काफी थी की किस तरह आफ्सपा क़ानून का सहारा लेकर सैनिकों द्वारा अत्याचार किया जाता है. पूरे आयोजन के दौरान मौजूद लोगों के चहरे पर क्षोभ और निराशा साफ देखी जा सकती थी. आयोजन के दौरान कुलपति विभूति नारायण ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की और कहा की “अब और इंतजार नहीं किया जा सकता. इरोम की आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए राज्य को झकझोरने की आवश्यकता है.” कुलपति ने कार्यक्रम के संयोजक कमला थोकचोन, चित्रलेखा, प्रकाश और संजीव को बधाई देते हुए इरोम के संघर्ष को आगे बढ़ाने की अपील की. प्रसिद्ध कथाकार संजीव ने काफी भावुक होते हुआ यही सवाल किया कि “क्या हम सब इरोम के मरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं?” वहीँ डिस्टेंस एजुकेशन के निदेशक धूमकेतू ने मीडिया की उदासीनता पर खिन्नता व्यक्त करते हुए पत्रकारों से आगे आने की अपील की. स्वामी सहजानंद सरस्वती संग्रहालय के राकेश श्रीमाल ने मणिपुर और इरोम के संघर्ष की पूरी तस्वीर श्रोताओं के सामने रखी. इस अवसर पर छात्रों ने भी इस लड़ाई को समूचे देश में फैलाने की बात कही. कार्यक्रम के अंत में एक कैंडिल मार्च किया गया जो विश्विद्द्यालय के ही गांधी हिल में समाप्त हो गया. इरोम शर्मिला के दर्द को मणिपुर के लोगों से अधिक शायद कोई नहीं समझ सकता. यही वजह है कि मणिपुर की कमला थोकचोन ने वर्धा जैसे छोटे शहर में भी इरोम और मणिपुर की जनता के दर्द से सबको वाकिफ कराने के लिए लगातार प्रयासरत हैं. अपनी कोशिशों और कुछ मित्रों के सहयोग से वह ऐसा करने में सफल भी हुई हैं. पिछले साल भी अनशन के 11 वर्ष बीतने पर विश्वविद्द्यालय के छात्र सड़कों पर उतरे थे और शहर में घूम-घूम कर लोगों को इस अनशन के बारे में बताया था. इरोम चानू शर्मिला के अनशन के 12 साल पूरे हो गए, लेकिन आज तक देश का आम आदमी इससे अनजान है. 12 साल के अहिंसात्मक अनशन के बावजूद न तो सरकार की नींद खुली और न ही मीडिया की. ऐसा लगता है मानो यह अनशन महज एक औपचारिकता बनकर रह गई है. हर साल कुछ लोग सामने आते हैं और सरकार को जगाने की असफल कोशिश करते है. इसे विडंबना कहें या हमारी बदनसीबी, एक क्रूर क़ानून पूरे पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर के लोगों को स्वछंद होकर जीने के हक़ से महरूम कर रहा है और हमारे देश लोगों को इसका अंदाजा भी नहीं है. 1958 से चले आ रहे सशस्त्र बल विशेष अधिकार क़ानून (आफ्स्फा) ने पूर्वोत्तर के लोगों का जीवन नरक बना दिया है. सेना के खौफ के साए में जी रही जनता को हर वक्त अपने सर पर खतरा मंडराता नजर आता है. 1956 में नागा विद्रोहियों से निबटने के लिए पहली बार मणिपुर में सेना भेजी गई. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इसे अस्थाई बताते हुए 6 महीने में वापस बुलाने की बात कही थी, लेकिन 1958 में आफ्सपा लागू कर दिया गया और 1972 में पूरे पूर्वोत्तर में इसका विस्तार कर दिया गया. पाँच दशकों से अधिक वक्त बीत गया लेकिन आज भी पूर्वोत्तर से लोकतंत्र नहीं बल्कि सेना का राज है. इस दौरान सैकड़ों निर्दोष लोगों का खून बह चुका है. बलात्कार और हत्या की घटनाएँ आए दिन घटती रहती हैं. अन्ना हजारे को लिखे एक पत्र में इरोम ने कहा था कि, “अन्ना जी आप भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं और देश में सबसे अधिक भ्रष्टाचार तो मणिपुर में हो रहा है.” इसके बावजूद मणिपुर के लिए कोई आगे नहीं आया. 4 नवम्बर 2000 को इंफाल 10 किलोमीटर दूर मालोम गाँव असम राइफल्स के जवानों ने बस स्टैंड पर बैठे आम लोगों पर गोलियाँ चला दी जिसमें 10 लोग मारे गए. यह सबकुछ इरोम शर्मीला के सामने हुआ. इरोम से यह सब देखा न गया और उसने आफ्सपा क़ानून के खिलाफ अनशन शुरू कर दिया. इस आन्दोलन को दबाने के लिए सरकार ने इरोम पर धरा 309 लगाकर आत्महत्या की कोशिश के आरोप में 21 नवंबर 2000 को गिरफ्तार कर जेल में दाल दिया. तब से शर्मीला लगातार हिरासत में ही है. उसे जबरन नाक से तरल पदार्थ दिया जा रहा है. जिस अस्पताल में उसे रखा गया है उसे जेल का रूप दे दिया गया है. एक साक्षात्कार में इरोम ने कहा था कि अनशन शुरू करने से पहले वह पूरी रात नहीं सो पाई थी, एक प्रश्न वह खुद से कर रही थी- “शांती की शुरुआत कहाँ और अंत कहाँ”. आज यही प्रश्न मणिपुर ही नहीं बल्कि पूरे देश के सामने मुँह बाये खड़ा है. क्या है आफ्स्फा क़ानून: 1. संदेह के आधार पर बिना वारंट कहीं भी घुसकर तलाशी ली जा सकती है. 2. किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है. कहीं भी लोगों के समूह पर गोली चलाई जा सकती है. 3. जब तक केंद्र सरकार की मंजूरी न मिले सशस्त्र बलों पर किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती.

Tuesday, August 14, 2012

गीतिका का गुनाहगार कौन...?

पूर्व विमान पारिचारिका (एयर होस्टेस) गीतिका शर्मा की ख़ुदकुशी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. 23 साल की गीतिका की ख़ुदकुशी के पीछे हरियाणा के गृह राज्य मंत्री गोपाल गोयल कांडा द्वारा मानसिक प्रताड़ना की बात सामने आई है. सुसाइड नोट की बिना पर उक्त मंत्री के खिलाफ एफ. आई. आर. भी दायर किया गया. टीवी चैनलों को एक और मसाला मिल गया. हर चैनल इस आत्महत्या की मिस्ट्री को सबसे पहले सुलझाने में लगा है. खबर को सनसनीखेज बनाने की हर संभव कोशिश जारी है, लेकिन पूरे हंगामे में अहम बात ही गौण होती जा रही है. महज 23 वर्ष की आयु में गीतिका ने आखिर कितनी प्रताड़ना झेली होगी की उसे मौत को गले लगाना पड़ा? एक राज्य का गृह मंत्री जब ऐसी हरकत कर सकता है तो महिलाएँ खुद को कहाँ सुरक्षित महसूस करेंगी? जिस उम्र में लड़कियाँ अपने करियर और शादी के सपने देखती हैं उस उम्र में गीतिका ने दुनिया को अलविदा कह दिया. सच तो यह है कि ये किसी एक लड़की की कहानी नहीं, बल्कि अच्छे करियर का सपना देखने वाली ऐसी हजारों लड़कियों की कहानी है जो शारीरिक और मानसिक यातना की शिकार हैं. भले ही मीडिया में इक्का-दुक्का मामले सामने आते हैं, लेकिन यह हजारों कामकाजी महिलाओं और सुंदर भविष्य का सपना देखने वाली महिलाओं की कहानी है. बात भले ही आत्महत्या तक न पहुँचे लेकिन प्रताड़ना झेलने के लिए ये अभिशप्त हैं. इनमें से कई परिस्थितियों का डट कर सामना करती हैं तो कुछ अपने सपनों को समेट लेती हैं, जबकि कई इस क्रूर समाज की शिकार बन जाती हैं. इसके बावजूद आरोप इन्हीं महिलाओं पर लगाया जाता है, क्योंकि इन्होंने सपने देखने का जुर्म किया है. आम लोगों की धारणा यही होती है कि जो महिला ज्यादा महत्वाकांक्षी होती हैं उन्हीं के साथ ऐसा होता है. खुद को बचाने का इससे अच्छा बहाना और क्या हो सकता है इस समाज के पास. हमारे देश के सबसे बड़े वर्ग (मध्यवर्ग) की कुछ ऐसी ही धारणा है. यही वजह है आज भी लड़कियों की आजादी पर पाबंदियाँ लगाई जाती हैं. उन्हें हर कदम पर इस क्रूर समाज से बचाने के लिए उनके सपनों को रौंदा जाता है. जिस तरह बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों का शिकार करती हैं उसी तरह किसी भी संस्थान में ऊँचे पदों पर आसीन व्यक्ति खुद को शिकारी समझता है. ऐसा नहीं कि केवल महिलाओं को ही परेशान किया जाता है. पुरुषों के सामने भी समस्याएँ आती हैं, लेकिन इस पुरुषसत्तात्मक समाज में महिलाओं को प्रताड़ित करना आसान और आनंददायक समझा जाता है. उन्हें निचले स्तर का ही माना जाता है. महिलाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने की कोशिशें चलती रहती हैं. हर कोई मौके की तलाश में तैयार रहता है. सामनेवाले को कमजोर पाते ही वह उसपर हावी होना चाहता है. ऐसा ही कुछ गीतिका और ऐसी हजारों लड़कियों के साथ हो रहा है. आश्चर्य की बात यह है कि जो अपराधी है उसे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जिन महिलाओं को यह भुगतना पड़ता है वह बदनाम हो जाती हैं. महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का मामला हो या बलात्कार का, समाज द्वारा महिलाएँ ही बहिष्कृत होती हैं, पुरूष अपराधी नहीं. ज्यादातर लोग मानते हैं कि ग्रामीण तथा अनपढ़ महिलाएँ हिंसा या अपराध की शिकार ज्यादा होती हैं, लेकिन सच तो यह है कि पढ़ी-लिखी, कामकाजी महिलाएँ हर दिन इस इस समस्या जूझ रही हैं. महानगरों में रहनेवाली ज्यादातर महिलाओं को हर दिन इस समस्या का सामना करना पड़ता है. पिछले दिनों जब महिला पत्रकारों की स्थिति पर एक शोध किया गया तो ज्यादातर महिलाओं ने यह स्वीकार किया कि महिलाओं को प्रताड़ित करने की कोशिशें चलती रहती हैं, लेकिन किसी ने भी खुद को इसका शिकार बताने परहेज किया. मतलब साफ़ है कि उन्हें अपनी छवि धूमिल होने का डर रहता है. यही वजह है कि उनकी समस्याएँ सबके सामने नहीं आ पातीं. समय के साथ लोगों के विचार बदले हैं और महिलाओं को कार्यक्षेत्र में महत्व भी मिल रहा है. लेकिन एक बड़ा वर्ग आज भी औरतों को अपने पावों की जूती समझता है. 10 सालों से समाचार चैनल में काम करने वाली "एक महिला पत्रकार का मानना है कि पुरुष अगर थोड़े कम योग्य हों तो चल जाता है, लेकिन महिलाओं को अगर काम करना है तो उसे बिलकुल परफेक्ट होना पड़ेगा." पुरुषवर्ग हर कदम पर अपनी महिला सहकर्मियों का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. कई बार वे सफल भी हो जाते हैं. अगर सफल न भी हुए तो भले ही उस महिला को नौकरी छोड़नी पड़े उनका कुछ नहीं बिगड़ता. गीतिका ने जाते-जाते इतनी हिम्मत तो दिखाई कि मंत्री का नाम सबके सामने आ पाया. ऐसी हिम्मत अगर वह जीते-जी दिखाती तो शायद उसे ही बेगैरत का खिताब दे दिया जाता. अपराध किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समाज का है जो ऐसे अपराधी को पनाह देता है. इस तरह के सभी अपराधियों को समाज से बहिष्कृत करने की जरूरत है. जो इंसान औरत को उपभोग या मनोरंजन की वस्तु समझता है उसे इंसान कहलाने का हक नहीं....

Monday, November 7, 2011

11 साल हो गए, अब तो जागो



मणिपुर में सैन्य बलों को मिले विषेशाधिकारों का विरोध कर रही इरोम शर्मिला को अनशन पर बैठे 11 साल पूरे हो गए । 4 नवंबर 2000 को इरोम चानू शर्मिला ने सैन्य बलों द्वारा जनता पर किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन आज तक उनकी मांग को मानना तो दूर बातचीत करना भी जायज नहीं समझा गया। आश्चर्य की बात है कि मीडिया ने भी इस मामले में चुप्पी साध ली है ।
वर्धा के युवा सड़कों पर

    जनता, सरकार और मीडिया की इसी चुप्पी को तोड़ने के लिए गत 5 नवंबर(शनिवार) को महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर वर्धा के युवा सड़क पर उतरे । विश्व इतिहास में अब तक की सबसे लंबी चलने वाली भूख हड़ताल के समर्थन में युवाओं ने रैली निकाली और धरना दिया । “इरोम तुम्हारे सपनों को मंजिल तक पहुचायेंगे”, “राजकीय कानूनी हिंसा बंद करो” जैसे कई नारे वर्धा की सड़कों पर गूंज रहे थे । वैसे तो यह रैली महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय से निकली लेकिन वर्धा के लोगों खासकर युवाओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया । 10 बजे सुबह निकला यह जुलुस शहर का चक्कर लगाते हुए जिलाधिकारी कार्यालय के सामने धरने पर बैठा । धरना के दौरान शर्मिला के लिए नारेबाजी के साथ-साथ नुक्कड़ नाटक का भी प्रदर्शन किया गया । युवाओं ने सांकेतिक रूप से एक दिन का अनशन भी किया। इसका उद्देश्य सरकार की नींद तोड़ने के साथ-साथ जनता को भी जागरूक करना था ।
मीडिया और हिंदी पट्टी की नज़र में
 
मणिपुर का जिक्र आते ही अधिकांश लोग कन्नी काटना शुरु कर देते हैं । कई दफा यहां तक सुनने को मिलता है कि अच्छा तो मणिपुर अपने ही देश में है । अगर दिल्ली का ही लें तो हमारे पुर्वोत्तर के साथियों को कमरा ढूंढने से लेकर अपनी स्वच्छ छवि तक के लिये काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है । देशभक्ती का तगमा लगाये अघिकांश लोगों के लिये सिर्फ चिंकीज होते है । एक सवाल जो लाजमी है कि क्या इसी तरह का कोई अनशन बिहार, झारखंड, यूपी जैसे किसी राज्य से हो रहा होता तो उसका भी यही हश्र होता ? क्या मीडिया तब उसे दरकिनार कर पाती ? वैसे भी जिस राज्य से मात्र दो सांसद हो और जिस कार्यक्रम से कोई खास टीआरपी नहीं मिलने जा रही हो उसके लिये कोई क्यों मगजमारी करे ! 
उद्देश्य से भटका आफ्सपा
 
1958 में नागा विद्रोह को नियंत्रित करने के लिए पहली बार आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट(आफ्सपा) कानून अमल में लाया गया । शुरूआती दौर में इसका उपयोग केवल नागा को नियंत्रित करने के लिए किया गया और इसे जल्द हटाने की बात भी कही गयी लेकिन ऐसा नहीं हुआ । इसके विपरीत यह कानून पूर्वोत्तर के सात राज्यों से होता हुआ काश्मीर तक पहुंच गया । इस कानून के अनुसार सैन्य बलों को यह अधिकार है कि वे शक के आधार पर किसी को भी गोली मार सकते हैं और उनपर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती । पिछले 53 वर्षों में हजारों बार यह साबित हो चुका है कि अफ्सपा लोकतंत्र पर काला धब्बा है । इस बात को सरकार भी दबी जुबान में स्वीकार करती आई है । 2004 में भारत सरकार द्वारा गठित रेड्डी की अध्यक्षता वाले कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि चाहे जो भी कारण रहे हों, ये कानून उत्पीड़न, नफरत, भेदभाव और मनमानी के साधन का एक प्रतीक बन गया है। हजारों निर्दोशों को गोलियों से भून दिया गया । महिलाओं के साथ दुराचार, बलात्कार, बच्चों का कत्ल जैसे कृत्यों को सरेआम अंजाम दिया जा रहा है । हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएं इतनी आम हो गयी हैं कि वहां जब कोई घर से निकलता है तो घरवाले इस बात से भयभीत रहते हैं कि पता नहीं वे वापस लौटेंगे या नहीं । इरोम चानू शर्मिला ने जनता को चैन और सुकून की जिंदगी दिलवाने के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं की । 
और अंत में
 
      सैन्य बलों ने इरोम को जबरदस्ती कृत्रिम साधनों के जरिए जिंदा तो रखा है लेकिन उनका शरीर बिल्कुल बेजान हो चुका है । इसके बावजूद शर्मिला के इरादे कमजोर नहीं पड़े हैं । वह ठीक से बोल नहीं पाती लेकिन अपनी आवाज को सरकार तक पहुंचाना उनका मकसद है ।  

11 साल हो गए, अब तो जागो



मणिपुर में सैन्य बलों को मिले विषेशाधिकारों का विरोध कर रही इरोम शर्मिला को अनशन पर बैठे 11 साल पूरे हो गए । 4 नवंबर 2000 को इरोम चानू शर्मिला ने सैन्य बलों द्वारा जनता पर किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन आज तक उनकी मांग को मानना तो दूर बातचीत करना भी जायज नहीं समझा गया। आश्चर्य की बात है कि मीडिया ने भी इस मामले में चुप्पी साध ली है ।
      जनता, सरकार और मीडिया की इसी चुप्पी को तोड़ने के लिए गत 5 नवंबर(शनिवार) को महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर वर्धा के युवा सड़क पर उतरे । विश्व इतिहास में अब तक की सबसे लंबी चलने वाली भूख हड़ताल के समर्थन में युवाओं ने रैली निकाली और धरना दिया । “इरोम तुम्हारे सपनों को मंजिल तक पहुचायेंगे”, “राजकीय कानूनी हिंसा बंद करो” जैसे कई नारे वर्धा की सड़कों पर गूंज रहे थे । वैसे तो यह रैली महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय से निकली लेकिन वर्धा के लोगों खासकर युवाओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया । 10 बजे सुबह निकला यह जुलुस शहर का चक्कर लगाते हुए जिलाधिकारी कार्यालय के सामने धरने पर बैठा । धरना के दौरान शर्मिला के लिए नारेबाजी के साथ-साथ नुक्कड़ नाटक का भी प्रदर्शन किया गया । युवाओं ने सांकेतिक रूप से एक दिन का अनशन भी किया। इसका उद्देश्य सरकार की नींद तोड़ने के साथ-साथ जनता को भी जागरूक करना था ।
मणिपुर का जिक्र आते ही अधिकांश लोग कन्नी काटना शुरु कर देते हैं । कई दफा यहां तक सुनने को मिलता है कि अच्छा तो मणिपुर अपने ही देश में है । अगर दिल्ली का ही लें तो हमारे पुर्वोत्तर के साथियों को कमरा ढूंढने से लेकर अपनी स्वच्छ छवि तक के लिये काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है । देशभक्ती का तगमा लगाये अघिकांश लोगों के लिये सिर्फ चिंकीज होते है । एक सवाल जो लाजमी है कि क्या इसी तरह का कोई अनशन बिहार, झारखंड, यूपी जैसे किसी राज्य से हो रहा होता तो उसका भी यही हश्र होता ? क्या मीडिया तब उसे दरकिनार कर पाती ? वैसे भी जिस राज्य से मात्र दो सांसद हो और जिस कार्यक्रम से कोई खास टीआरपी नहीं मिलने जा रही हो उसके लिये कोई क्यों मगजमारी करे !
1958 में नागा विद्रोह को नियंत्रित करने के लिए पहली बार आम्र्ड फोर्सेस स्पेषल पावर एक्ट(आफ्सपा) कानून अमल में लाया गया । शुरूआती दौर में इसका उपयोग केवल नागा को नियंत्रित करने के लिए किया गया और इसे जल्द हटाने की बात भी कही गयी लेकिन ऐसा नहीं हुआ । इसके विपरीत यह कानून पूर्वोत्तर के सात राज्यों से होता हुआ काश्मीर तक पहुंच गया । इस कानून के अनुसार सैन्य बलों को यह अधिकार है कि वे शक के आधार पर किसी को भी गोली मार सकते हैं और उनपर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती । पिछले 53 वर्षों में हजारों बार यह साबित हो चुका है कि अफ्सपा लोकतंत्र पर काला धब्बा है । इस बात को सरकार भी दबी जुबान में स्वीकार करती आई है । 2004 में भारत सरकार द्वारा गठित रेड्डी की अध्यक्षता वाले कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि चाहे जो भी कारण रहे हों, ये कानून उत्पीड़न, नफरत, भेदभाव और मनमानी के साधन का एक प्रतीक बन गया है। हजारों निर्दोशों को गोलियों से भून दिया गया । महिलाओं के साथ दुराचार, बलात्कार, बच्चों का कत्ल जैसे कृत्यों को सरेआम अंजाम दिया जा रहा है । हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएं इतनी आम हो गयी हैं कि वहां जब कोई घर से निकलता है तो घरवाले इस बात से भयभीत रहते हैं कि पता नहीं वे वापस लौटेंगे या नहीं । इरोम चानू शर्मिला ने जनता को चैन और सुकून की जिंदगी दिलवाने के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं की।
      सैन्य बलों ने इरोम को जबरदस्ती कृत्रिम साधनों के जरिए जिंदा तो रखा है लेकिन उनका शरीर बिल्कुल बेजान हो चुका है । इसके बावजूद शर्मिला के इरादे कमजोर नहीं पड़े हैं । वह ठीक से बोल नहीं पाती लेकिन अपनी आवाज को सरकार तक पहुंचाना उनका मकसद है ।  

11 साल हो गए, अब तो जागो



मणिपुर में सैन्य बलों को मिले विषेशाधिकारों का विरोध कर रही इरोम शर्मिला को अनशन पर बैठे 11 साल पूरे हो गए । 4 नवंबर 2000 को इरोम चानू शर्मिला ने सैन्य बलों द्वारा जनता पर किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन आज तक उनकी मांग को मानना तो दूर बातचीत करना भी जायज नहीं समझा गया। आश्चर्य की बात है कि मीडिया ने भी इस मामले में चुप्पी साध ली है ।
      जनता, सरकार और मीडिया की इसी चुप्पी को तोड़ने के लिए गत 5 नवंबर(शनिवार) को महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर वर्धा के युवा सड़क पर उतरे । विश्व इतिहास में अब तक की सबसे लंबी चलने वाली भूख हड़ताल के समर्थन में युवाओं ने रैली निकाली और धरना दिया । “इरोम तुम्हारे सपनों को मंजिल तक पहुचायेंगे”, “राजकीय कानूनी हिंसा बंद करो” जैसे कई नारे वर्धा की सड़कों पर गूंज रहे थे । वैसे तो यह रैली महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय से निकली लेकिन वर्धा के लोगों खासकर युवाओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया । 10 बजे सुबह निकला यह जुलुस शहर का चक्कर लगाते हुए जिलाधिकारी कार्यालय के सामने धरने पर बैठा । धरना के दौरान शर्मिला के लिए नारेबाजी के साथ-साथ नुक्कड़ नाटक का भी प्रदर्शन किया गया । युवाओं ने सांकेतिक रूप से एक दिन का अनशन भी किया। इसका उद्देश्य सरकार की नींद तोड़ने के साथ-साथ जनता को भी जागरूक करना था ।
मणिपुर का जिक्र आते ही अधिकांश लोग कन्नी काटना शुरु कर देते हैं । कई दफा यहां तक सुनने को मिलता है कि अच्छा तो मणिपुर अपने ही देश में है । अगर दिल्ली का ही लें तो हमारे पुर्वोत्तर के साथियों को कमरा ढूंढने से लेकर अपनी स्वच्छ छवि तक के लिये काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है । देशभक्ती का तगमा लगाये अघिकांश लोगों के लिये सिर्फ चिंकीज होते है । एक सवाल जो लाजमी है कि क्या इसी तरह का कोई अनशन बिहार, झारखंड, यूपी जैसे किसी राज्य से हो रहा होता तो उसका भी यही हश्र होता ? क्या मीडिया तब उसे दरकिनार कर पाती ? वैसे भी जिस राज्य से मात्र दो सांसद हो और जिस कार्यक्रम से कोई खास टीआरपी नहीं मिलने जा रही हो उसके लिये कोई क्यों मगजमारी करे !
1958 में नागा विद्रोह को नियंत्रित करने के लिए पहली बार आम्र्ड फोर्सेस स्पेषल पावर एक्ट(आफ्सपा) कानून अमल में लाया गया । शुरूआती दौर में इसका उपयोग केवल नागा को नियंत्रित करने के लिए किया गया और इसे जल्द हटाने की बात भी कही गयी लेकिन ऐसा नहीं हुआ । इसके विपरीत यह कानून पूर्वोत्तर के सात राज्यों से होता हुआ काश्मीर तक पहुंच गया । इस कानून के अनुसार सैन्य बलों को यह अधिकार है कि वे शक के आधार पर किसी को भी गोली मार सकते हैं और उनपर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती । पिछले 53 वर्षों में हजारों बार यह साबित हो चुका है कि अफ्सपा लोकतंत्र पर काला धब्बा है । इस बात को सरकार भी दबी जुबान में स्वीकार करती आई है । 2004 में भारत सरकार द्वारा गठित रेड्डी की अध्यक्षता वाले कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि चाहे जो भी कारण रहे हों, ये कानून उत्पीड़न, नफरत, भेदभाव और मनमानी के साधन का एक प्रतीक बन गया है। हजारों निर्दोशों को गोलियों से भून दिया गया । महिलाओं के साथ दुराचार, बलात्कार, बच्चों का कत्ल जैसे कृत्यों को सरेआम अंजाम दिया जा रहा है । हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएं इतनी आम हो गयी हैं कि वहां जब कोई घर से निकलता है तो घरवाले इस बात से भयभीत रहते हैं कि पता नहीं वे वापस लौटेंगे या नहीं । इरोम चानू शर्मिला ने जनता को चैन और सुकून की जिंदगी दिलवाने के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं की।
      सैन्य बलों ने इरोम को जबरदस्ती कृत्रिम साधनों के जरिए जिंदा तो रखा है लेकिन उनका शरीर बिल्कुल बेजान हो चुका है । इसके बावजूद शर्मिला के इरादे कमजोर नहीं पड़े हैं । वह ठीक से बोल नहीं पाती लेकिन अपनी आवाज को सरकार तक पहुंचाना उनका मकसद है ।  

Friday, October 21, 2011

अन्ना आंदोलन और मीडिया कवरेज


हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में जीते हैं. इसे बनाने, बचाने और संवारने की जिम्मेवारी हमारी आपकी और संसदीय संस्थाओं की है. लोकतंत्र दो स्तरों पर काम करता है- एक हमारे स्वविवेक पर और दूसरा लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से.
हम जैसे-जैसे समानता, आजादी, बंधुत्व को जानने समझने लगते हैं, इसके हनन के बारे मे भी हमारी समझ विकसित होने लगती है. इसके बाद हम निकल पड़ते हैं इसे बनाने और बचाने के लिये, परिणाम जाने वगैर.
अन्ना का आंदोलन भी एसे समय में हुआ जब समाज का आम आदमी भी खुद को असुरक्षित और परेशान महसूस करने लगा था. तंत्र की लगातार विफलताओं के खिलाफ लोग एकजुट होने लगे. इसे विड्म्बना ही कहेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में पूरे आंदोलन के दौरान लोक और तंत्र एक दूसरे के विपरीत दिखे.
२जी घोटाला, आदर्श सोसाईटी घोटाला, कॉमन्वेल्थ घोटाला, रेड्डी बंधुओं के अवैध खनन का मामला, मंहगाई, भ्रष्टाचार कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसने आम जनता को सड़कों पर आने को विवश कर दिया. अन्ना के आंदोलन ने आम जनता के उबाल को सिर्फ एक प्लेटफॉर्म दिया.
२जी स्पेक्ट्रम घोटाले में मीडिया के कुछ नामचीन पत्रकारों के नाम सामने आये. इससे खुद मीडिया कलंकित भी हुई. अन्ना आंदोलन नें मीडिया के इस दाग के लिये गंगाजल का काम किया.
अन्ना आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन की तरह व्यापक कवरेज भी मिला. याद कीजिये वह क्षण जब चौटाला और उमा भारती को ग्राउंड जीरो से हूट किया गया था और मीडिया ने उसी तरलता से उस घटना क्रम को लपका भी. सारे चैनल के कैमरे उस ओर हो गये थे. लेकिन इस बात पर भी चर्चा होना आवश्यक है कि जिस समय इंडिया गेट पर मीडिया के एक नामचीन हस्ती को हूट किया जा रहा था किसी चैनल के कैमरे ने खुद को उधर फोकस नहीं किया. अन्ना का यह आंदोलन इस चौथे खम्भे को भी अपने गिरेबान में झांकने को विवश करता है.
इस पूरे आंदोलन में जिस तरह संसदीय लोकतंत्र के नुमाईंदों की तालाश होती रही कहीं ऐसा न हो कि आगे चल कर मुख्यधारा की मीडिया के विकल्प की तालाश को भी मजबूती मिले.
वैसे कथादेश के मीडिया वार्षिकी में संपादक द्व्य अविनाश दास और दिलीप मंडल कहते हैं 21वीं सदी के मौजुदा दौर में परंपरागत मीडिया जब उम्मीद की कोई रौशनी नहीं दिखा रहा तब वैकल्पिक मीडिया के कुछ रूप सामने आये हैं. इसमें इंटरनेट पे खास तौर पे नज़र रखने की जरूरत है.
अन्ना के आंदोलन को आज वैकल्पिक मीडिया का भी भरपूर सहयोग मिला. अन्ना की टीम और आम जनता नें भी जमकर इसका इस्तेमाल किया.
ऐसा नहीं है कि अन्ना के विरोध में स्वर नहीं फूटे. लोगों ने अन्ना के विचारधारा और उनकी ईमानदारी पर भी संदेह किया. यह सच है कि अन्ना गांधी और जे.पी नहीं हैं. गांधी के पास एक व्यापक दृष्टिकोण था, गांधीवाद आज शोध का विषय होता है. जे.पी के पास सारे विपक्षियों का व्यापक समर्थन था सिर्फ कम्यूनिस्टों को छोड़कर. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद एक बात तो है कि अन्ना का आंदोलन गैरराजनैतिक है. और सबसे बड़ी बात कि इतने बडे जन सैलाब के समर्थन के बावजूद भी आंदोलन का अहिंसक रह जाना मायने रख्ता है. एक महत्वपूर्ण मुद्दा जो अन्ना और उसकी टीम के लिये है कि इतनी बड़ी उर्जा का इस्तेमाल सिर्फ जनलोकपाल तक ही सिमट कर न रह जाय.
74 के जे.पी आंदोलन में एक नारा सड़कों पर गूंजा करता था “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है…..”  अन्ना के इस आंदोलन में खून में उबाल लाने वाला ऐसा कोई नारा तो नहीं गूंजा, लेकिन समर्थकों के सिर पर "मैं भी अन्ना” वाली टोपी जरूर देखने को मिली.
अन्ना गांधी नहीं हैं, लेकिन गांधीवादी लीक को पकडकर इतने दिन तक चलने वाला व्यक्ति कुछ न कुछ गांधी तो हो ही जायेगा. यह अन्ना की स्वच्छ, बेदाग और ईमानदार छवि ही है जिसके पीछे भारतीय लोकतंत्र के हर तबके की जनता खड़ी है.
हमारे लोकतंत्र में व्यक्तिविशेष सर्वोपरि न होकर संविधान सर्वोपरि है. वजह यह है कि कहीं हमारा लोकतंत्र खतरे में न पड़ जाय. अन्ना या सिविल सोसाईटी के सदस्यों के द्वारा भी आंदोलन के अब तक के पड़ाव में कभी भी यह नहीं दिखाया गया कि वो खुद या अन्ना को संविधान से सर्वोपरि मानते हैं. माननीय सुप्रीम कोर्ट कई न्यायिक फैसलों के दौरान यह कह चुकी है कि सं विधान में संसोधन किया जा सकता है हां इस बात की वाध्यता है कि उसके मूल विचार में कोई परिवर्तन न हो. अन्ना भी लोकतंत्र की हिफाजत के लिये कानून बनाने की मांग कर रहे हैं.
सरकार, अल्पसंख्यक, बुद्धिजीवियों से लेकर वाम धर्मनिरपेक्ष दलित और मीडिया आलोचकों के द्वरा इस व्यापक कवरेज को असंतुलित और पक्षपातपूर्ण बताया जाता रहा है. यहां तक कहा जाता है कि अगर आंदोलन को 24x7 कवरेज नहीं मिला होता तो यह इतना व्यापक और लंबा नहीं खिंचता. लेकिन आनंद प्रधान कहते हैं “ माफ़ कीजिये मीडिया या न्यूज चैनल कोई आंदोलन कोई खड़ा नहीं कर सकते. किसी अंदोलन के पीछे कई राजनैतिक, सामाजिक कारक और परिस्थितियां होती है. मीडिया किसी आंदोलन का समर्थन  और कवरेज कर सिर्फ एक प्रतिध्वनी पैदा कर सकता है.”  वैसे ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि मीडिया ने राहुल गांधी के भट्टा परसौल यात्रा को भी मीडिया ने व्यापक कवरेज दिया था. लेकिन यह भी सच है कि कि पहली बार किसी जनाअंदोलन के द्वारा मीडिया का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया.
सुंदरलाल बहुगुना, मेधा पाटेकर, निगमानंद से लेकर शर्मिला तक कितने लोगों ने आंदोलन किया और कर रहे हैं. लेकिन किसी को इतना व्यापक कवरेज नहीं मिला. इसके एक वजह यह भी है कि टीम अन्ना को प्रोफेशनल और अनुभवी लोगों का भरपूर सहयोग मिला. मनीष सिंसोदिया, अवस्थी मुरलीधरन और विभव कुमार ऐसे ही कुछ नाम हैं. सब कुछ पहले से तय कर लिया जाता था. प्रेस रिलीज कैसा होगा, किस बात पर कितनी और कब प्रतिकिर्या देनी है, कब लाईव होना है सब का एक तय खांका होता था. जनमत सग्रह का सुझाव मशहूर राजनैतिक विशलेषक राजेंन्द्र यादव का था तो सांसदों के घरों के घेराव करने का अइडिया अमिर खान ने टीम अन्ना को दिया. कुल मिलाकर लोकतंत्र के हिफाजत में मीडिया का सफलता पूर्वक इस्तेमाल हुआ या यूं कहें कि मीडिया ने भरपूर साथ दिया.
अन्ना आंदोलन से इतनी बात तो निकल कर सामने आई कि प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त पर सोचने की जरूरत है. अन्ना का यह आग्रह न सिर्फ उन ताकतों से है जो तंत्र की बागडोर संभाले हुए हैं बल्कि उनसे भी है जो लोकतंत्र को विस्तार और गहराई देने में लगे हुए हैं.
संदर्भ :- तहलका, कथादेश, बलॉगवाणी