Wednesday, May 22, 2013

थम नहीं रहा यौन हिंसा का सिलसिला

पूरे देश में बलात्कार और बलात्कारियों के खिलाफ आन्दोलन जोर-शोर से चल रहा है. नए-नए क़ानून बनाए जा रहे हैं. इसके बावजूद बलात्कार तथा छेड़छाड़ के मामलों में कमी नहीं हो रही बल्कि दिन-ब-दिन बढती ही जा रही है. बिहार में भी तक़रीबन हर दिन अखबारों में बलात्कार और छेड़छाड़ की ख़बरें आम बात हो गई है. इससे भले ही पूरा देश अनभिज्ञ रहे पर दर्द और तकलीफ तो यहाँ भी उतनी ही है. मासूम गुड़िया की दिल दहला देने वाली घटना के बाद तक़रीबन दर्जन भर मामले यहाँ सामने आ चुके हैं. जो मामले किसी वजह से दब चुके हैं, उसके बारे में बताना संभव नहीं. यह एक ऐसा अपराध है जिसमें हर तरह से सजा पीड़ित को ही मिलती है. कई बार समाज के डर से तो कई बार अपराधियों की धमकियों से पीड़िता को चुपचाप दर्द का घूँट पीकर रहना पड़ता है. यह दर्द कुछ पल, दिन या साल का नहीं होता बल्कि पूरे उम्र नासूर की तरह चुभता रहता है. हाल के दिनों में राज्य में घटित कुछ दुष्कर्मों पर भी अगर नजर डालें तो राज्य में महिलाओं स्थिति का कुछ तो अंदाज जरुर लग सकता है.



18 अप्रैल को राजधानी पटना से करीब 10 किलोमीटर दूर बिहटा में सात साल की मासूम बच्ची को अपराधियों ने हवस का शिकार बनाया. साथ ही पीड़ित परिवार को धमकी देकर मामले को दबाने की कोशिश भी की, हालांकि 4 दिन बाद मामला पुलिस के पास पहुँच गया. वहीँ पश्चिम चंपारण के मझौलिया गाँव में 17 साल की नाबालिग को पहले तो अपराधियों ने अगवा किया फिर उसी की माँ के सामने ही सामूहिक बलात्कार किया.

6 मई की रात राजधानी से कुछ ही दूर बिहिया में आठ साल की मासूम के साथ एक किशोर ने दुष्कर्म किया. दूसरे ही दिन 7 मई को आरा से रघुनाथपुर जा रही सवारी गाडी में एक महिला के साथ दुष्कर्म किया गया. ब्रह्मपुर थाना क्षेत्र के इस अपराधी ने ट्रेन के पिछले डब्बे मंा बैठी महिला को देखा और मौका पाते ही अपनी हवस का शिकार बना लिया.
7 मई को दरभंगा जिले के हरशेर गाँव में सात वर्ष की बच्ची को उसी के गाँव के 19 साल के युवक ने अपनी हवस का शिकार बनाया. इधर मुजफ्फरपुर जिले के मिश्रीटोला गाँव की एक नाबालिग के साथ उसी के प्रेमी ने अपने साथियों के साथ मिल कर दुष्कर्म किया. विरोध करने पर उसे ब्लेड से घायल कर तेजाब से जलाया गया. पीड़िता के बेहोश होने पर उसे मरा हुआ समझ कर अपराधी भाग गए. 6 मई को जब उसे होश आया तो अपनी हालत देखकर बिलख पड़ी. वह हादसे से इस कदर टूट चुकी है कि अब जीना नहीं चाहती. 6 मई को ही खुद को तांत्रिक कहने वाले एक मधुबनी जिले के केसुली गाँव में एक युवती के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की, हालांकि लड़की के शोर मचाने पर गाँववालों ने पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी.

ये केवल कुछ उदाहरण हैं, ऐसे कई मामले पुलिस विभाग की फाइलों में लगातार दर्ज हो रहे हैं तो कई डर या शर्म की वजह दब जाते हैं. कई बार तो पुलिस खुद ही मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करने लगती है. इसका उदाहरण है रोहतास सूर्यपुरा थाना, जहाँ छेड़खानी की शिकायत करने आई लड़कियों को बहला-फुसला कर वापस कर दिया गया. बार-बार शिकायत करने पर भी जब पुलिस की तरफ से कोई कार्यवाई नहीं की गई तो मनचलों को छेड़खानी की खुली छुट मिल गई. सड़कों पर खुले-आम लड़कियों के साथ छेडखानी बढती गई. अंत में जब मामला मुख्यमंत्री के जनता दरबार में पहुँचा तो अभियुक्तों की गिरफ्तारी हो सकी. अकसर इन मामलों में पुलिस का रवैया असंवेदनशील रहा है, जैसा कि दिल्ली बलात्कार मामले में भी देखा गया है. दोष केवल पुलिस या प्रशासन का नहीं माना जा सकता. पूरे समाज की मानसिकता महिला-विरोधी रही है. आश्चर्य तो तब होता है जब लोग बलात्कार के लिए भी महिलाओं को ही दोषी मानते हैं. उनके पहनावे तथा बाहर घुमने-फिरने को बुरा मानते हैं. एक अधेड़ महिला ने तो यहाँ तक कह दिया कि “लडकियां ही लड़कों को दुष्कर्म के लिए आकर्षित करती हैं, मर्दों की तो जात ही ऐसी है.” ऐसे कई लोग मिल जायेंगे जो लड़कियों को ही नसीहत देने से बाज नहीं आते.

पहले 16 दिसंबर को दिल दहला देने वाली घटना और फिर पिछले महीने 5 साल की मासूम गुड़िया के साथ दरिंदगी के मामले ने पूरे देश का दिल दहला दिया. आम जनता सड़कों पर उतर आई. महिलाओं की सुरक्षा, पुलिस तथा प्रशासन का नकारात्मक रवैया तथा शासन व्यवस्था की खामियों पर चर्चा जारी है. देश की राजधानी होने की वजह से दिल्ली की घटना निश्चित तौर पर मीडिया और लोगों को ज्यादा झकझोरती है. लेकिन आँकड़े बताते हैं बिहार में भी यौन उत्पीड़न के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2001 से 2013 तक राज्य में 11433 महिलाएँ दुष्कर्म की शिकार हो चुकी हैं. इसका मतलब है कि हर साल औसतन 141 महिलाओं को दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाया है. पटना महिला हेल्पलाइन में दर्ज मामलों के अनुसार भी यौन हिंसा के मामलों में हर साल बढ़ोतरी हो रही है. बिहार पुलिस की वेबसाईट के अनुसार जुलाई 2012 तक कॉगनिजेबल(संज्ञेय) अपराधों की संख्या 94188 है. राज्य में 14 से 49 वर्ष की 56 प्रतिशत महिलायें शारीरिक एवं यौन हिंसा की शिकार हैं.

केवल सिवान जिले के पुलिस अपराध शाखा से मिले आँकड़ों के अनुसार साल 2012 में जिले में 20 मामले बलात्कार और छेड़खानी के हैं. कई बार तो यह भी देखा गया है एकतरफ़ा प्यार के नाकाम होने या दुष्कर्म के प्रयासों में विफल होने पर तेज़ाब हमले द्वारा लड़की को जिन्दगी भर की सजा दी जाती है. 2011 में अमेरिका के कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में कहा गया है कि भारत में 1999-2010 के बीच 153 तेजाबी हमले हुए हैं. अकसर इन हमलों में पीड़िता के चेहरे को निशाना बनाया गया. बिहार में भी ऐसे हमले के कई मामले प्रकाश में आ चुके हैं. चंचल और तबस्सुम इसके ताजा उदाहरण हैं.

देश के अन्य इलाकों की तरह यहाँ भी मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं. मासूमों के साथ ऐसा घिनौना अपराध मानसिक रूप से विकृत व्यक्ति ही कर सकता है. सवाल यह भी उठता है कि समाज में इतनी मानसिक विकृति क्यों बढ़ रही है ? इस मामले में ए. एन. सिन्हा सामाजिक संस्थान में सामाजिक मनोविज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. एस. एम. ए. युसूफ का कहना है कि “आधुनिक जीवनशैली युवाओं को नैतिक रूप से कमजोर बना रही है. साथ ही शराब और अन्य नशीले पदार्थ उन्हें खुद पर नियंत्रण नही रखने देते. साथ ही संचार के आधुनिक माध्यम उन्हें पथभ्रमित कर रहे हैं.” दूसरी ओर जे. डी. विमेंस कॉलेज में मनोविज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफ़ेसर अख्तर जहाँ का कहना है संयुक्त परिवार मंि बच्चों का नैतिक विकास ज्यादा अच्छी तरह होता था. परिवार के सदस्यों खासकर बुजुर्गों का डर भी उन्हें अनैतिक कार्यों से दूर रखता था, लेकिन इनदिनों एकाकी परिवार का प्रचलन बढ़ गया है. माता-पिता दोनों बाहर काम करने जाते हैं, इसलिए बच्चों पर अधिक ध्यान नहीं दे पाते. साथ ही युवकों को किसी का डर नही रह गया है इन वजहों से इन घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है. इसके अलावा टेलीविजन, इंटरनेट आदि युवाओं को भटका रहे हैं.”

राज्य तथा केंद्र सरकार महिला सशक्तीकरण के लिए अनेकों योजनाएँ चला रही है. राज्य सरकार ने तो पंचायतों में महिलाओं 50 प्रतिशत आरक्षण भी दिया है. सारी योजनाओं का मकसद नारी को मजबूत और सुरक्षित बनाना है. अब सवाल यह उठता है की क्या नारी सच में सशक्त हो रही है? क्या हमारा पुरुषसत्तात्मक समाज नारी की स्वतंत्र और स्वावलंबी छवि को स्वीकार कर रहा है? हर बार जब हम ऐसी किसी घटना के बारे में देखते या सुनते हैं तो सरकार और प्रशासन के मत्थे सारा दोष मढ देते हैं, लेकिन मन में यह सवाल उठाना भी लाजिमी है कि आखिर कब तक समाज और खासकर युवा वर्ग अपनी जिम्मेवारी समझेगा और देश को सम्मानजनक स्थिति में पहुँचाएगा?


बढ़ते कदम में प्रकाशित

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