Tuesday, August 23, 2011

आपका सरनेम क्या है….?


मेरा जन्म और पालन-पोषण बिहार में हुआ. घर का माहौल अच्छा रहा और लड़की होने के बावजूद काफ़ी स्वतन्त्रता मिली. बचपन में सोचने की शक्ती तो बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन शुरू से चलन से हटकर काम करना अच्छा लगता था. शायद यही वजह थी कि आठ्वीं क्लास में स्कूल बदलते समय मैंने अपना नाम केवल ^सुनीता^ रखा. घरवालों को भी कोई आपत्ती नहीं थी. लेकिन जैसे-जैसे बडी हुई मुझे इस बात का एहसास हुआ कि नाम में सरनेम होना बहुत जरुरी है. फॉम भरने से लेकर कई इन्टरव्यू तक में मुझसे यही सवाल पूछा जाता रहा. बार-बार मुझे अपनी सफ़ाई में तर्क देना बड़ा अटपटा सा लगा. यह सिलसिला आज भी जारी है. मैं अकेली नहीं जिसे इस प्रश्न से जूझना पड रहा है. इस कतार में कई लोग हैं जिन्हें मैं जानती हूं. काफ़ी लोग तो सरनेम केवल इसलिये जानना चाहते हैं कि वो सामने वाले कि जाति के बारे में जान सकें. हम जैसे लोगों को ताने भी सुनने पडते हैं क्योंकि हम अपने धर्म और जाति का अपमान करते हैं.
बिहार में रहते हुए मुझे इतनी अधिक समस्या नहीं हुई कि मैं इस बारे में कुछ लिखने को मजबूर हो जाऊं. हां जब से महाराष्ट्र आई, तकरीबन हर दिन मुझे इस सवाल से जुझना पड रहा है. ट्रेन से लेकर विश्विद्दालय और होस्टल में नामांकन कराने तक हर जगह मुझे इसी सवाल का सामना करना पडा. बात केवल सवाल तक रहती तो शायद इतनी बुरी न लगती लेकिन मुझसे इसके लिये जिरह की जाती है. लोग यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि बिना सरनेम का भी किसी का नाम हो सकता है.
ट्रेन से वर्धा आने के क्रम में मेरी दोस्ती एक सभ्रांत परिवार से हुई. फ़ोन नम्बर का आदान-प्रदान भी हुआ. जब मैंने उनसे उनका नाम पुछा तो उन्होंने नाम बताने की जगह कहा कि हमलोग जायसवाल हैं, आप इसी नाम से नम्बर सेव कर लो और मैने कर भी लिया. अब सरनेम बताने की बारी मेरी थी, लेकिन मैंने उन्हें अपना नाम बताया. वो लोग मेरा सरनेम जानना चाह रहे थे. इस बात पे काफ़ी देर तक बहस भी हुई. धीरे-धीरे यह सवाल मेरे सामने रोज आने लगा. कभी-कभी तो यह महसूस होता है कि अपने नाम में सरनेम न लगाकर मैने बहुत बडी गलती कर दी.
चूंकि मैं पत्रकारिता से जुडी रही हूं, इंटरव्यू का दौर चलता रहता है. कई बार लोगों ने मुझे यह भी सुझाव दिया है कि आप साक्षात्कार के दौरान अपने किसी रिश्तेदार का नाम ले लेना जिससे आपकी जाति का पता उन्हें लग सके. इसकी वजह ये थी कि इस टीम मे जो लोग रहते थे वे मेरी जाति से ताल्लुक रखते थे.
एक और वाक्या बताना चाहूंगी. पिछ्ले दिनों दिल्ली में एक न्यूज चैनल में मेरा इंटरव्यू हुआ. जो टीम मेरा इंटरव्यू ले रही थी उसने भी मेरे नाम में सरनेम न होने की वजह पूछी. मेरे तर्क से वे प्रभावित तो हुए लेकिन तब तक उन्हें चैन न आया जब तक मेरी जाति के बारे में पता न चला.
एक सवाल दिमाग में कौंधने लगा कि क्या हमारी पह्चान केवल हमारी जाति या धर्म से है? क्या अपने परिवार, जाति, धर्म, कुल से अलग हमारी पहचान नहीं हो सकती?
मेरा मानना है कि व्यक्ति की खुद की पह्चान जरुरी है. हो सकता है कई लोग मेरी बातों से इत्तफ़ाक न रखते हों लेकिन इतना तो तय है कि किसी कि जाति का पता लगाए बगैर यदि उससे दोस्ती की जाये तो वो दोस्ती बहुत प्यारी होती है. अक्सर देखा गया है कि हर जाति के संबंध में लोग किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं. जाति के बारे में जानने के बाद सामने वाले के प्रति एक खास तरह की मनोवृत्ति बना ली जाती है जो उसके साथ सरासर नाइंसाफ़ी है.
मैं यह नहीं कहती कि जो लोग अपने नाम के आगे सरनेम लगाते हैं उनकी कोई अलग पहचान नहीं होती. लेकिन हर नाम का एक खास अर्थ होता है. यदि आप गौर करें तो पायेंगे किसी भी व्यक्ति के नाम का गुण उसके स्वभाव में जरुर आता है. एक जैसे नामों वाले भी कई लोग होते हैं, ऐसे में थोडी समस्या हो सकती है. ऐसे में सरनेम या नीकनेम का सहारा लिया जा सकता है. लेकिन अपने सरनेम को बचाने के लिये नाम का सहारा लेना मुझे उचित नहीं जान पडता. अपने पूर्वजों को अपनी कामयाबी का जरिया बनाना खुद को कमजोर समझना है.

Monday, August 22, 2011

आपका सरनेम क्या है...


मेरा जन्म और पालन-पोषण बिहार में हुआ. घर का माहौल अच्छा रहा और लडकी होने के बावजूद काफ़ी स्वतन्त्रता मिली. बचपन में सोचने की शक्ती तो बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन शुरू से चलन से हटकर काम करना अच्छा लगता था. शायद यही वजह थी कि आठ्वीं क्लास में स्कूल बदलते समय मैंने अपना नाम केवल ^सुनीता^ रखा. घरवालों को भी कोई आपत्ती नहीं थी. जैसे-जैसे बडी हुई मुझे इस बात का एहसास हुआ कि नाम में सरनेम होना बहुत जरुरी है. फ़ोर्म भरने से लेकर कई इन्टरव्यू तक में मुझसे यही सवाल पूछा जाता रहा. बार-बार मुझे अपनी सफ़ाई में तर्क देना बडा अटपटा सा लगा. यह सिलसिला आज भी जारी है. मैं अकेली नहीं जिसे इस प्रश्न से जूझना पड रहा है. इस कतार में कई लोग हैं जिन्हें मैं जानती हूं. काफ़ी लोग तो सरनेम केवल इसलिये जानना चाहते हैं कि वो सामने वाले कि जाति के बारे में जान सकें. हम जैसे लोगों को ताने भी सुनने पडते हैं क्योंकि हम अपने धर्म और जाति का अपमान करते हैं.
बिहार में रहते हुए मुझे इतनी अधिक समस्या नहीं हुई कि मैं इस बारे में कुछ लिखने को मजबूर हो जाऊं. हां जब से महाराष्ट्र आई, तकरीबन हर दिन मुझे इस सवाल से जुझना पड रहा है. ट्रेन से लेकर विश्विद्दालय और होस्टल में नामांकन कराने तक हर जगह मुझे इसी सवाल का सामना करना पडा. बात केवल सवाल तक रहती तो शायद इतनी बुरी न लगती लेकिन मुझसे इसके लिये जिरह की जाती है. लोग यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि बिना सरनेम का भी किसी का नाम हो सकता है.
ट्रेन से वर्धा आने के क्रम में मेरी दोस्ती एक सभ्रांत परिवार से हुई. फ़ोन नम्बर का आदान-प्रदान भी हुआ. जब मैंने उनसे उनका नाम पुछा तो उन्होंने नाम बताने की जगह कहा कि हमलोग जायसवाल हैं, आप इसी नाम से नम्बर सेव कर लो और मैने कर भी लिया. अब सरनेम बताने की बारी मेरी थी, लेकिन मैंने उन्हें अपना नाम बताया. वो लोग मेरा सरनेम जानना चाह रहे थे. इस बात पे काफ़ी देर तक बहस भी हुई. धीरे-धीरे यह सवाल मेरे सामने रोज आने लगा. कभी-कभी तो यह मह्सूस होता है कि अपने नाम में सरनेम न लगाकर मैने बहुत बडी गलती कर दी.
चूंकि मैं पत्रकारिता से जुडी रही हूं, इंटरव्यू का दौर चलता रहता है. कई बार लोगों ने मुझे यह भी सुझाव दिया है कि आप साक्षात्कार के दौरान अपने किसी रिश्तेदार का नाम ले लेना जिससे आपकी जाति का पता उन्हें लग सके. इसकी वजह ये थी कि इस टीम मे जो लोग रह्ते थे वे मेरी जाति से ताल्लुक रखते थे.
एक और वाक्या बताना चाहूंगी. पिछ्ले दिनों दिल्ली में एक न्यूज चैनल में मेरा इंटरव्यू हुआ. जो टीम मेरा इंटरव्यू ले रही थी उसने भी मेरे नाम में सरनेम न होने की वजह पूछी. मेरे तर्क से वे प्रभावित तो हुए लेकिन तब तक उन्हें चैन न आया जब तक मेरी जाति के बारे में पता न चला.
एक सवाल दिमाग में कौंधने लगा कि क्या हमारी पह्चान केवल हमारी जाति या धर्म से है? क्या अपने परिवार, जाति, धर्म, कुल से अलग हमारी पहचान नहीं हो सकती?
मेरा मानना है कि व्यक्ति की खुद की पह्चान जरुरी है. हो सकता है कई लोग मेरी बातों से इत्तफ़ाक न रखते हों लेकिन इतना तो तय है कि किसी कि जाति का पता लगाए बगैर यदि उससे दोस्ती की जाये तो वो दोस्ती बहुत प्यारी होती है. अक्सर देखा गया है कि हर जाति के संबंध में लोग किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं. जाति के बारे में जानने के बाद सामने वाले के प्रति एक खास तरह की मनोवृत्ति बना ली जाती है जो उसके साथ सरासर नाइंसाफ़ी करना है.
मैं यह नहीं कह्ती कि जो लोग अपने नाम के आगे सरनेम लगाते हैं उनकी कोई अलग पह्चान नहीं होती. लेकिन हर नाम का एक खास अर्थ होता है. यदि आप गौर करें तो पायेंगे किसी भी व्यक्ति के नाम का गुण उसके स्वभाव में जरुर आता है. एक जैसे नामों वाले भी कई लोग होते हैं, ऐसे में थोडी समस्या हो सकती है. ऐसे में सरनेम या नीकनेम का सहारा लिया जा सकता है. लेकिन अपने सरनेम को बचाने के लिये नाम का सहारा लेना मुझे उचित नहीं जान पडता. अपने पूर्वजों को अपनी कामयाबी का जरिया बनाना खुद को कमजोर समझना है.

Tuesday, February 22, 2011

मर्यादाओं का बोझ


महिला आयोग, महिला हेल्प लाईन, नारी सशक्तीकरण योजना, नारीवाद इस तरह के शब्द आज भी यह बताने के लिये काफी हैं कि तमाम परिवर्तनों के बावजूद भी हम स्त्रियां पुरुषसत्तात्मक समाज की गुलाम ही हैं. हमारी स्थितियों में सुधार की कथित कोशिश की जा रही है. कुछ अपवाद जरूर मिल जायेंगे. हमे बहलाने, फुसलाने और बरगलाने के लिये ढेर सारे विशेषण और उपमायें दिये गये हैं. खुद का शोषण और दोहन करते करवाते हुए हम इस तथाकथित सभ्य समाज की संस्कृति के पोषण और संवर्धन का जिम्मा उठाये हुए हैं. सब कुछ सहते-झेलते हुए चुपचाप बनावटी मुस्कान लिये जी लेना ही आज की सुसंस्कृत नारी की पहचान है.
समाज में व्यापक पैमाने पर बदलाव आये हैं. हमारा समाज पहले की तुलना में उदार भी हुआ है. सब कुछ होने के बावजूद भी अगर आज नारी निर्णय लेने की को्शिश करती है तो वह पुरुषों को खटक जाती है (अधिकांशतः). हमारे रिवाज, जिसे पोषित करने का जिम्मा हमने उठा रखा है अब तक हमारे लिये बेड़ियां ही सिद्ध हुई हैं.
रिवाजों के अनुसार हिंदु धर्म में शादी एक बार ही होती है. अगर आप सभ्य हैं तो आपको सिर्फ और सिर्फ अरेंज मैरेज पर ही भरोसा करना होगा. हां कुछ हद तक लड़कों को इस मामले में छूट है कि वो अपने पसंद की लड़की से शादी कर सकते हैं. जिस लड़के से आपकी शादी कर दी जाती है ताउम्र उस बंधन को निबाहना आपकी नैतिक जिम्मेवारी बन जाती है. आपके विचार उससे कितने मेल खाते हैं ये कभी मुद्दा बनता ही नहीं है. हमारे समाज का ताना-बाना ही ऐसा है कि एक बार जिसके साथ आपको बांध दिया गया है हर हाल में आपको वहीं रहना होगा. यही वजह है कि अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां तलाक की घटना कम होती है. इस वजह से हम यह न मान लें कि हमारे यहां सारे विवाहित जोड़े खुशहाल जीवन जी रहे हैं.
दाम्पत्य जीवन में छोटे-मोटे झगड़े और नोंक-झोंक का होना आम बात है. कुछ हद तक इससे पति-पत्नी के बीच प्रेम बढता भी है. जैसा कि एक गाना भी हमलोगों ने सुना है कि “तुम रूठी रहो मैं मनाता रहुं इन अदाओं पे और प्यार आता है……….”. हां अगर दंपति के बीच विचारों की समानता नहीं है तो ये झगड़े कभी-कभी रिश्तों मे अवसाद घोल देते हैं. कई बार ऐसा देखा गया है कि सालों बीत जाने के बाद भी उनके बीच प्रेम पनपता ही नहीं है और दोनों विवश होकर एक दूसरे के साथ जीने को मजबूर होते हैं. इन आपसी कलह और दूरी का दुष्प्रभाव बच्चों पर भी पड़ता है. इन बच्चों को अपने माता-पिता से ज्यादा लगाव तो नहीं ही होता है इनका नजरिया ज़िंदगी और रिश्तों के प्रति बदलने भी लगता है.
कहने के लिये तो इनका परिवार होता है, बच्चे होते हैं और दिखावे के लिये इनके पास एक खुशहाल ज़िंदगी भी होती है. इन सबसे अलग ये जोड़े डिप्रेशन में जी रहे होते हैं. अब सवाल उठता है कि जहां रिश्तों में प्रेम हो ही नहीं उसे ढोने से क्या फायदा ? दोनो खुशहाल रहें तो बात समझ में आती है. रिश्ते अगर मजबूरी बन जाये तो दोनो को अपना रास्ता अलग कर लेना ही समझदारी कही जायेगी.
अलग होने या तलाक लेने का निर्णय अगर एक महिला ले तो यह समाज के लिये अपच हो जाती है. यहां तक कि हिन्दी या संस्कृत में इसका कोई पर्यायवाची शब्द भी नहीं है. इस श्ब्द और घटना को वर्जित ही मान लें. अगर कोई महिला आजिज होकर यह कदम उठा भी ले तो हमारा थाकथित सभ्य समाज उसका जीना दूभर कर देती है. घरवालों-पड़ोसवालों से उसे इतनी प्रताड़ना मिलती है कि वह मान लेती है कि उसने कोई बहुत बड़ा गुनाह किया हो. हद तो तब हो जाती है जब खुद की मां-बहन भी उसे यह नसीहत देते मिलती है कि जिस घर को तेरी डोली गई है वहीं से तेरी अर्थी निकले तो ज्यादा बेहतर. उसे समाजिक परंपराओं की दुहाई देते हुए कष्ट और तकलीफ सहकर रिश्तों को बचाने की नेक सलाह दी जाती है. यहां आकर परंपरा और सभ्यताओं की आड़ में मानवता मर जाती है. एक इंसान की खुशी का गला घोट दिया जाता है. उसे दर्द और तकलीफ को सहते हुए भी उसी रिश्ते में जीने को मजबूर कर दिया जाता है.
हिन्दु मैरेज एक्ट में 1976 में संशोधन कर धारा 68 के तहद हिन्दुओं को तलाक लेकर अलग रहने का अधिकार दिया गया है. हर साल इसके द्वारा काफी लोग अलग भी हो रहे हैं लेकिन आज भी हमारा समाज इसे स्विकार करने को तैयार नहीं है. हालांकि पुरुषों को इस मामले में आजादी है. वो जिससे चाहे जब चाहे अपनी हैसियत के हिसाब से संबंध बना और तोड़ सकता है. यही फैसला अगर एक त्रस्त होकर लेती है तो उसे मानसिक ही नहीं शारीरिक प्रताड़नाओं से भी गुज़ड़ना पड़ता है. उसे उपदेश दिया जाने लगता है कि भला है बुरा है जैसा भी है तेरा पति तेरा देवता है. इस तरह के उपदेश उससे मिलने वाला हर शख्स देने को आतुर रहता है, भले ही उसकी समझ जितनी भी हो.
आज हमारे समाज की जरूरतें बदल रही है. विकसित होते इस दौर में वह भी सुविधा सम्पन्न हो रहा है. आये दिन अपनी सुविधाओं में इजाफा भी कर रहा है. अब जरूरत है कि वह अपनी सोच भी बदले. हम पहले इंसान हैं लड़कियां तो बाद में हैं. जीवनसाथी तो वो है जो हर सुख-दुख, धूप-छांव में एक-दूसरे के साथ रहे. वो एक दूसरे के पूरक भी हों. समझौते की स्थिती को आगे बढाने से बेहतर है कि रास्ते अलग कर लें. ऎसे मामले में नई ज़िंदगी की शुरुआत करना ही समझदारी कही जायेगी.

Tuesday, January 25, 2011

संस्कारों तले दबती महिलायें


पटना के राजाबाजार इलाके में रहनेवाली शालिनी मुश्किल से 18 साल की भी नहीं हुई थी कि उसके माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। आनन-फानन में लड़का भी ढूंढ लिया गया। न तो उसकी मर्जी जानने की कोशिश की गई और न ही पंसद। इंटर की परीक्षा पास करने से पहले ही परिवार वालों ने उसके हाथ पीले कर दिये और जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लिया। तमाम लड़कियों की तरह उसने भी ढेरों सपने बुने थे। एक पल तो लगा मानो सारे सपने एक ही चोट से चकनाचूर हो गए। लेकिन शालिनी ने फैसला किया कि जो जिन्दगी उसे दी गई है, उसमें वह खुश रहेगी। अपने परिवार के तमाम लोगों को खुश करने का जिम्मा भी उसने अपने सिर ले लिया। आज शादी को 10 साल से भी अधिक हो चुके हैं। और आज भी वह अपने ससुराल वालों को खुश रखने के लिए अपनी खुशियों की कुर्बानी दे रही है या यूं कहें कि खुद को मार रही है। कभी सास और ननद के ताने तो कभी पति की मार, यही शालिनी का नसीब बन चुका है। हर दिन उसे नीचा दिखाने के लिए कोई नया बहाना ढूंढा जाता है। मायके वालों से पैसे मांगने के लिए दबाव डाला जाता है। जब उसकी दोस्तों और हितैशियों ने महिला आयोग या कोर्ट जाने की सलाह दी तो उसकी जवाब था कि ”रहना तो इन्हीं लोगों के साथ है, लड़ाई करने से क्या मिलेगा।“
ये कहानी केवल एक शालिनी की नहीं बल्कि रोज ऐसी कई शालिनी घरेलू हिंसा की शिकार बन रही हैं। इसकी वजह कभी लड़की का परिवार तो कभी समाज है, लेकिन सबसे बड़ी वजह तो उसका खुद अत्याचार सहना है। इसे नियती मानकर वह अपनी आदत बना लेती हैं और यही शिक्षा और तथाकथित संस्कार अपनी बेटियों को भी देती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह पंरपरा चली आ रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार की 60 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं जो पूरे देश में सबसे अधिक है। इनमें 50 प्रतिशत शारीरिक उत्पीड़न, 19 प्रतिशत यौन उत्पीड़न, 2 प्रतिशत मानसिक यातना और और 59 प्रतिशत शारीरिक तथा यौन उत्पीड़न दोनों की शिकार हैं। पूरे देश में जहां घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं का प्रतिशत 37 है वहीं बिहार में इसका प्रतिशत 60 होना चैंकाने वाला है। NFHS(National Family Health Survey)  की मानें तो इसकी सबसे बड़ी वजह है अशिक्षा। रिपोर्ट के अनुसार शारीरिक, मानसिक तथा यौन उत्पीड़न की शिकार इन महिलाओं में से 64 प्रतिशत अशिक्षित हैं। उनके साथ दुव्र्यवहार करने वाले 63 प्रतिशत पुरूष अशिक्षित हैं। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि शिक्षित होने का मतलब केवल साक्षर होना ही नहीं।
घरेलू हिंसा की शिकार 40.2 प्रतिशत औरतें ग्रामीण इलाकों में रह रही हैे। क्या इसका मतलब उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी न होना है? कुछ हद तक इसे सही माना जा सकता है लेकिन इसे पूर्ण सच्चाई नहीं मानी जा सकती। राज्य सरकार ने महिलाओं के विकास के लिए अनेकों योजनाओं की शुरूआत की है। पंचायत चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण, मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना, मुख्यमंत्री बालिका साईकिल योजना, मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना और लक्ष्मीबाई पंेशन योजना के अलावा ढेरों ऐसी योजनाएं चल रही हैं जो औरतों को आर्थिक तथा शैक्षणिक मजबूती प्रदान कर सके। समय-समय पर सरकार तथा विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा इन्हें अपने अधिकारों का एहसास भी कराया जाता है। लेकिन रूढ़ीवादी समाज में पली-बढ़ी इन औरतों के लिए शायद ये ज्यादा महत्व नहीं रखता। क्योंकि इनके संस्कार इन्हें इसकी इजाजत ही नहीं देते। नारी को देवी और शक्ति की उपमा देने वाले टीवी चैनल्स भी नायिका को ममता, त्याग, सब्र और सहनशीलता की मूरत बताने में ही अपनी भलाई मानते हैं। महिलाएं भी इसे देखकर थोड़ी देर के लिए खुश हो जाती हैं। कुल मिलाकर औरतों की एक ही तस्वीर उभर कर सामने आती है - त्याग और बलिदान की मूरत. वो समझने को तैयार ही नहीं हैं कि ये उनके खिलाफ एक सोची-समझी साजिश है.
कष्ट सहना और अपनी ईच्छाओं का गला घोंटकर परिवार की खुशियों के बारे में सोचना ये अपना परम कर्तव्य समझती हैं। बचपन से इन्हें यही तालीम दी जाती है। परिवार और समाज इसे औरत की महानता और जिम्मेवारी का हवाला देकर किनारा कर लेता है। औरतों की ऐसी स्थिति पूरे देश में है लेकिन हमारा बिहार इसमें सबसे आगे है। दहेज हत्या के मामले में भी राज्य की स्थिति कुछ ऐसी ही है। बिहार, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश इस मामले में देश में अव्वल नम्बर पर है। यह बात खुद महिला एवं बाल कल्याण मंत्री कृष्णा तीरथ ने लोक सभा को बतायी थी। ये तो सरकारी आंकड़े हैं, हकीकत इससे कितनी अधिक हो सकती है इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2008 में कुल 1210 दहेज हत्या का मामला प्रकाश में आया। 2009 में कुछ कमी आयी और यह 918 पर पहुंच गया। यदि वाकई महिलाओं की हालत में सुधार हो रही है तो घरेलू हिंसा की शिकार औरतों की इतनी अधिक तादाद क्यों है? अगर दहेज हत्या में कमी आयी भी है तो इसका एक कारण कानून का भय भी हो सकता है। लेकिन क्या राज्य की औरतों में जागरूकता आयी है? क्या ये अपनी इच्छा से कुछ कर सकती हैं? घर में अपनी पसंद का खाना तक बना और खा सकती हैं? ऐसे कई अनगिनत सवाल हैं जिनका जवाब इनके पास नहीं है। ममता और त्याग की देवी मान ये खुद को छलना बेहतर मानती आयी हैं। और अगर इससे भी काम न चले तो किस्मत तथा भगवान की मर्जी जैसे लफ्जों का आसरा ले लेती हैं। जबतक ये औरतें पुरूष प्रधान समाज को जवाब देने की जगह खुद को बहलाना बंद नहीं करेंगी इनकी स्थिति में सुधार की गुंजाइश  संभव नहीं है।



संस्कारों के तले दबती महिलायें

पटना के राजाबाजार इलाके में रहनेवाली शालिनी मुश्किल से 18 साल की भी नहीं हुई थी कि उसके माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। आनन-फानन में लड़का भी ढूंढ लिया गया। न तो उसकी मर्जी जानने की कोशिश की गई और न ही पंसद। इंटर की परीक्षा पास करने से पहले ही परिवार वालों ने उसके हाथ पीले कर दिये और जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लिया। तमाम लड़कियों की तरह उसने भी ढेरों सपने बुने थे। एक पल तो लगा मानो सारे सपने एक ही चोट से चकनाचूर हो गए। लेकिन शालिनी ने फैसला किया कि जो जिन्दगी उसे दी गई है, उसमें वह खुश रहेगी। अपने परिवार के तमाम लोगों को खुश करने का जिम्मा भी उसने अपने सिर ले लिया। आज शादी को 10 साल से भी अधिक हो चुके हैं। और आज भी वह अपने ससुराल वालों को खुश रखने के लिए अपनी खुशियों की कुर्बानी दे रही है या यूं कहें कि खुद को मार रही है। कभी सास और ननद के ताने तो कभी पति की मार, यही शालिनी का नसीब बन चुका है। हर दिन उसे नीचा दिखाने के लिए कोई नया बहाना ढूंढा जाता है। मायके वालों से पैसे मांगने के लिए दबाव डाला जाता है। जब उसकी दोस्तों और हितैशियों ने महिला आयोग या कोर्ट जाने की सलाह दी तो उसकी जवाब था कि ”रहना तो इन्हीं लोगों के साथ है, लड़ाई करने से क्या मिलेगा।“
ये कहानी केवल एक शालिनी की नहीं बल्कि रोज ऐसी कई शालिनी घरेलू हिंसा की शिकार बन रही हैं। इसकी वजह कभी लड़की का परिवार तो कभी समाज है, लेकिन सबसे बड़ी वजह तो उसका खुद अत्याचार सहना है। इसे नियती मानकर वह अपनी आदत बना लेती हैं और यही शिक्षा और तथाकथित संस्कार अपनी बेटियों को भी देती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह पंरपरा चली आ रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार की 60 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं जो पूरे देश में सबसे अधिक है। इनमें 50 प्रतिशत शारीरिक उत्पीड़न, 19 प्रतिशत यौन उत्पीड़न, 2 प्रतिशत मानसिक यातना और और 59 प्रतिशत शारीरिक तथा यौन उत्पीड़न दोनों की शिकार हैं। पूरे देश में जहां घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं का प्रतिशत 37 है वहीं बिहार में इसका प्रतिशत 60 होना चैंकाने वाला है। NFHS(National Family Health Survey)  की मानें तो इसकी सबसे बड़ी वजह है अशिक्षा। रिपोर्ट के अनुसार शारीरिक, मानसिक तथा यौन उत्पीड़न की शिकार इन महिलाओं में से 64 प्रतिशत अशिक्षित हैं। उनके साथ दुव्र्यवहार करने वाले 63 प्रतिशत पुरूष अशिक्षित हैं। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि शिक्षित होने का मतलब केवल साक्षर होना ही नहीं।
घरेलू हिंसा की शिकार 40.2 प्रतिशत औरतें ग्रामीण इलाकों में रह रही हैे। क्या इसका मतलब उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी न होना है? कुछ हद तक इसे सही माना जा सकता है लेकिन इसे पूर्ण सच्चाई नहीं मानी जा सकती। राज्य सरकार ने महिलाओं के विकास के लिए अनेकों योजनाओं की शुरूआत की है। पंचायत चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण, मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना, मुख्यमंत्री बालिका साईकिल योजना, मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना और लक्ष्मीबाई पंेशन योजना के अलावा ढेरों ऐसी योजनाएं चल रही हैं जो औरतों को आर्थिक तथा शैक्षणिक मजबूती प्रदान कर सके। समय-समय पर सरकार तथा विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा इन्हें अपने अधिकारों का एहसास भी कराया जाता है। लेकिन रूढ़ीवादी समाज में पली-बढ़ी इन औरतों के लिए शायद ये ज्यादा महत्व नहीं रखता। क्योंकि इनके संस्कार इन्हें इसकी इजाजत ही नहीं देते। नारी को देवी और शक्ति की उपमा देने वाले टीवी चैनल्स भी नायिका को ममता, त्याग, सब्र और सहनशीलता की मूरत बताने में ही अपनी भलाई मानते हैं। महिलाएं भी इसे देखकर थोड़ी देर के लिए खुश हो जाती हैं। कुल मिलाकर औरतों की एक ही तस्वीर उभर कर सामने आती है - त्याग और बलिदान की मूरत. वो समझने को तैयार ही नहीं हैं कि ये उनके खिलाफ एक सोची-समझी साजिश है.
कष्ट सहना और अपनी ईच्छाओं का गला घोंटकर परिवार की खुशियों के बारे में सोचना ये अपना परम कर्तव्य समझती हैं। बचपन से इन्हें यही तालीम दी जाती है। परिवार और समाज इसे औरत की महानता और जिम्मेवारी का हवाला देकर किनारा कर लेता है। औरतों की ऐसी स्थिति पूरे देश में है लेकिन हमारा बिहार इसमें सबसे आगे है। दहेज हत्या के मामले में भी राज्य की स्थिति कुछ ऐसी ही है। बिहार, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश इस मामले में देश में अव्वल नम्बर पर है। यह बात खुद महिला एवं बाल कल्याण मंत्री कृष्णा तीरथ ने लोक सभा को बतायी थी। ये तो सरकारी आंकड़े हैं, हकीकत इससे कितनी अधिक हो सकती है इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2008 में कुल 1210 दहेज हत्या का मामला प्रकाश में आया। 2009 में कुछ कमी आयी और यह 918 पर पहुंच गया। यदि वाकई महिलाओं की हालत में सुधार हो रही है तो घरेलू हिंसा की शिकार औरतों की इतनी अधिक तादाद क्यों है? अगर दहेज हत्या में कमी आयी भी है तो इसका एक कारण कानून का भय भी हो सकता है। लेकिन क्या राज्य की औरतों में जागरूकता आयी है? क्या ये अपनी इच्छा से कुछ कर सकती हैं? घर में अपनी पसंद का खाना तक बना और खा सकती हैं? ऐसे कई अनगिनत सवाल हैं जिनका जवाब इनके पास नहीं है। ममता और त्याग की देवी मान ये खुद को छलना बेहतर मानती आयी हैं। और अगर इससे भी काम न चले तो किस्मत तथा भगवान की मर्जी जैसे लफ्जों का आसरा ले लेती हैं। जबतक ये औरतें पुरूष प्रधान समाज को जवाब देने की जगह खुद को बहलाना बंद नहीं करेंगी इनकी स्थिति में सुधार की गुंजाइश  संभव नहीं है।

Friday, December 17, 2010

बालीवुड की बीमारियां
बालीवुड ने शुरूआती दौर से समाज के अनछूए मुद्दों को फिल्मों के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाया है। हांलाकि मसाला और थ्रीलर फिल्मों को व्यवसाय के लिहाज से बेहतर माना जाता है लेकिन इसके बावजूद गंभीर विषयों पर फिल्में लगातार बन रही हैं। आजकल बाॅलीवुड में बिमारियों की थीम पर फिल्में बनाने का दौर चल रहा है। वैसे यहां भी हिन्दी फिल्मों के निर्माताओं ने हाॅलीवुड से ही प्रेरणा ली है, लेकिन फिर भी इसे एक साहसिक कदम ही कहा जाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि बिमारियां समाज का हिस्सा हैं और फिल्मों में उसे तवज्जो भी दी जाती रही है। लेकिन इनदिनों फिल्मों के जरिए ऐसी बिमारियों के बारे में लोगों में जागरूकता आई है जिसके बारे बहुत कम लोगों को जानकारी थी। मेडिकल थीम पर आधारित फिल्में दर्शकों को काफी भा रही हैं।
2007 में आयी फिल्म ‘तारे जमीन पर’ में डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे की उलझनों ने न केवल दर्शकों को इस बिमारी की तह तक पहुंचाया बल्कि इससे निबटने का उपाय भी काफी सहज तरीके से बता दिया। आमिर खान के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उम्दा अभिनय और उत्कृष्ट फिल्मांकन ने मरीज की पीड़ा को दर्शकों के दिल तक पहुंचा दिया तथा फिल्म भी सुपरहीट साबित हुई। यही नहीं फिल्म भारत की ओर से आॅस्कर के लिए भी भेजी गई। ‘मिस्टर परफेक्सनिस्ट’ के नाम से मशहूर आमिर की यह फिल्म सही मायने में एक यादगार फिल्म है। अपनी बेहतरीन अदाकारी से आमिर ने फिल्म ‘गजनी’ में एक ‘शाॅर्ट टर्म मेमोरी लाॅस’ के मरीज को दर्शकों के बीच मशहूर कर दिया। इससे पहले इस बिमारी की जानकारी सीमित लोगों को ही थी, हालांकि कई काॅलेजों तथा यूनिवर्सिटी में इन मरीजों को आरक्षण काफी समय से दिया जा रहा था।
अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘पा’ में एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो अपनी उम्र से काफी बड़ा ही नहीं दिखता बल्कि उसे बचपन मेें ही बुढ़ापे का सामना भी करना पड़ता है। प्रोजेरिया नामक इस बिमारी में मरीज की आम लोगों की अपेक्षा 4-6 गुणा ज्यादा तेजी से बढ़ता है। प्रोजेरिया की जानकारी केवल उन लोगों को ही थी जो इससे पीड़ित थे या फिर उनका कोई अपना इसका शिकार बन चुका था। बाकी दर्शक-वर्ग के लिए यह बिमारी एक चैंकाने वाली बिमारी थी। सदी के महानायक ने फिल्म ‘ब्लैक’ में एक ऐसी लड़की के शिक्षक का किरदार निभाया जो न बोल सकती थी, ने सुन सकती थी और न देख सकती थी। उस लड़की को नई जिंदगी देने वाला यह शिक्षक अपने उम्र के आखिरी पड़ाव में ‘अल्जेमर’ नामक बिमारी से ग्रसित हो जाता है और अपने आप को भी भूल जाता है। एक मूक, बधीर और अंधी लड़की की संवेदनाओं को समझना आम इंसान के बस की बात नहीं है लेकिन रानी मुखर्जी ने इस किरदार को जिवंत कर दिया। फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली ने बड़ी ही खुबसूरती से सारी संवेदनाओं को पर्दे पर उतारकर दर्शकों के दिल में जगह दे दी।
काजोल ने अपनी फिल्मी कैरियर का दूसरा दौर शुरू किया होम प्रोडक्शन फिल्म ‘यू मी और हम’ से। हालांकि यह फिल्म बाॅक्स आॅफिस पर कुछ खास कमाल नहीं सकी लेकिन ‘अल्जमेर’ की मरीज के रूप में काजोल के अभिनय की काफी तारीफ हुई। अजय देवगन और काजोल ने इसे एक ऐसी लव-स्टोरी के तौर पर बनाई जिसमें नायिका की यादाश्त कभी-कभी चली जाती है। यहां तक कि वह अपनी खुद की पहचान भी भूल जाती है। ऐसे इंसान के साथ पूरी जिंदगी बिताना काफी मुश्किल है लेकिन फिल्म ने सिखाया कि प्यार किसी भी बिमारी की सबसे बड़ी दवा है।
अभी कुछ ही दिनों पहले राकेश रौशन ने ‘क्रेजी-4’ का निर्माण किया। फिल्म में चार मानसिक रूप से विक्षिप्त किरदार के दुनिया को देखने और समझने का नजरिया दिखाया गया है। शायद आप और हम इस बारे में कभी सोच भी नहीं सकते थे कि इनकी भी एक दुनिया होगी लेकिन राकेश रौशन ने इसे पर्दे उतारकर हमारे सोचने का दायरा ही बढ़ा दिया। हांलाकि फिल्म अपने विषय को लेकर नहीं बल्कि अन्य कारणों से चर्चा में रही। राकेश रौशन ने फिल्म ‘कोई मिल गया’ में अपने बेटे रितिक रौशन को ‘आॅटिज्म’ के मरीज का किरदार बनाया। रितिक ने भी इसे बखुबी निभाया और कई अवार्ड्स भी जीते।
हाल ही में निर्माता-निर्देशक करण जौहर अपनी महत्वकांक्षी फिल्म ‘माई नेम इज खान’ का निर्माण किया। इसमें नायक शाहरूख खान ने ‘एस्पर्जर सिन्ड्रोम’ के मरीज की भूमिका निभाई थी। इस बिमारी भी की जानकारी भी बहुत कम लोगों को थी। इमरान खान अभिनीत ‘लक’ में नायक को डेक्ट्रोकार्डिया नामक बिमारी रहती है। इसमें रोगी का दिल बायीं ओर की बजाय दाहिनी ओर होता है। मेडिकल थीम पर बनने वाली फिल्मों की सूची काफी लंबी है। अपना आसमान, रेड द डार्क साइड, एकलव्य, अपरीचित, जुर्म, आंखे, अक्स, अर्थ, दुश्मन जैसी अनेक फिल्मों ने दर्शकों को अनजान बिमारियों से रू-ब-रू कराया है। फिल्म ‘फिर मिलेंगे’ में एड्स जैसी लाइलाज बिमारी के बारे जागरूकता लाने की कोशिश की गई है। लोगों में फैली गलतफहमी और अज्ञानता को दूर करते हुए यह बताया गया कि एड्स छूआछूत की बिमारी नहीं है।
इतना तो दिया तय है कि इन फिल्मों ने न केवल इन बिमारियों के बारे में हमारी जानकारी बढ़ाई है बल्कि यह भी सीख दी है कि बिमारियों के बावजूद ये मरीज इसी समाज का हिस्सा हैं और इनके साथ रहना मुश्किल नहीं है। साथ ही अपनेपन और प्यार को इन बिमारियों के दवा के रूप में प्रचारित भी किया जा रहा है।

Sunday, November 7, 2010

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